देवा मेला में कविताओं ने बिखेरी शब्दों की सुगंध, हास्य और भावनाओं से सजी यादगार संध्या


बाराबंकी। ऐतिहासिक देवा मेला एवं प्रदर्शनी-2026 की सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में मंगलवार की रात्रि आयोजित विराट कवि सम्मेलन में साहित्य, संवेदना, हास्य-व्यंग्य और राष्ट्रप्रेम का अनूठा संगम देखने को मिला। देश के विभिन्न हिस्सों से आए कवियों एवं कवयित्रियों ने अपनी सशक्त रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को कभी खूब हंसाया, कभी भावविभोर किया तो कभी ओजस्वी काव्यपाठ से राष्ट्रप्रेम और जीवन के गूढ़ संदेशों से रूबरू कराया। कवियों की प्रभावशाली प्रस्तुतियों पर ऑडिटोरियम देर रात तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।
विराट कवि सम्मेलन का शुभारंभ पूर्व सांसद श्री एपी गौतम, श्री सुंदर लाल भारती एवं मेला कमेटी के सदस्यगण क्रमशः चौधरी मोहम्मद फैज महमूद, श्री राय सुरेश्वर बली एवं श्री कुंवर सानिध्य बली ने संयुक्त रूप से मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता चौधरी मोहम्मद फैज महमूद ने की, जबकि कवि सम्मेलन का संयोजन वरिष्ठ कवि अम्बरीश अम्बर ने किया। कोलकाता के प्रख्यात कवि प्रो. राहुल अवस्थी ने अपने प्रभावशाली, चुटीले और रोचक अंदाज में मंच का संचालन कर कवि सम्मेलन को नई ऊंचाई प्रदान की।
कवि सम्मेलन का आगाज कवयित्री अंशु प्रिया दुबे ने मां सरस्वती की वंदना ‘दिन-रात जपूं तेरा नाम’ से किया।
इसके पश्चात लखनऊ के गीतकार अखंड प्रताप सिंह ने जीवन के विविध रंगों को अपनी गीतात्मक प्रस्तुति में पिरोते हुए पढ़ा—
“है सुबह तो कभी शाम है जिंदगी,
है कभी विष कभी जाम है जिंदगी।
हो गए जिसकी खातिर गुमनाम हम,
बस उसी शख्स के नाम है जिंदगी।”
प्रयागराज के हास्य कवि अखिलेश द्विवेदी ने अपनी रचना के माध्यम से जीवन में खुशियां बांटने का संदेश देते हुए कहा—
“हम अपना दर्द बांटे या न बांटें, पर हंसी बांटें,
भुलाकर सारे गम अपने सभी के संग खुशी बांटें।”
कवि योगेंद्र मधुप ने प्रेम और विरह की भावनाओं को शब्द देते हुए पढ़ा—
“किसी के प्यार में पागल नहीं हूं,
लगी है चोट पर घायल नहीं हूं।
संजू हर रात सुबह धोया जाऊं,
मैं ऐसी आंख का काजल नहीं हूं।”
इसके बाद मंच का संचालन कर रहे प्रो. राहुल अवस्थी ने संघर्ष, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की भावनाओं को अपनी कविता में पिरोते हुए कहा—
“सहा जो वार, वो बेकार जाता,
मेरे सूरज को पाला मार जाता।
भोपाल की कवयित्री डॉ. अनु सपन ने अपनी ओजपूर्ण रचना के माध्यम से संघर्ष और आत्मनिर्भरता का संदेश देते हुए कहा—
“जिंदा रहना है तो जिंदगी से लड़ो,
आसमान से नहीं रोटियां आएंगी।”
वहीं, प्रेम की कोमल अनुभूतियों को अभिव्यक्त करते हुए उन्होंने अपनी दूसरी रचना में पढ़ा—
“याद जब-जब तुम्हारी आती है,
आंख इक छंद गुनगुनाती है।
रात पढ़ती है प्रेम के दोहे,
धूप चौपाइयां सुनाती है।”
कवयित्री अंशु प्रिया दुबे ने देश की सीमाओं पर तैनात सैनिकों के प्रति सम्मान और उनके सुरक्षित रहने की कामना को अपनी भावपूर्ण रचना में अभिव्यक्त करते हुए पढ़ा—
“चरागों की खातिर हवा कर रही हूं,
प्रिया अपने हक को अदा कर रही हूं।
जो सरहद पे संगीन ले के खड़े हैं,
सलामत रहें ये दुआ कर रही हूं।”
राजस्थान के भीलवाड़ा से आए कवि योगेंद्र शर्मा ने वीर रस की ओजस्वी प्रस्तुति से श्रोताओं में राष्ट्रभक्ति का संचार किया। वीरता और शौर्य का प्रभावशाली चित्रण करते हुए उन्होंने पढ़ा—
“वो चला द्रुत वेग से अरि छातियों को चीरता,
झुक गया अंबर पगों में देख उसकी वीरता।
भारती का लाल अब्दुल दुश्मनों का काल था,
सच कहूं तो सिंहनी के दूध का दिग्पाल था।”
देर रात तक चले इस विराट कवि सम्मेलन में हास्य, व्यंग्य, श्रृंगार, गीत और वीर रस की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को साहित्य के विविध रंगों से सराबोर कर दिया। प्रत्येक रचना पर श्रोताओं ने तालियों और वाहवाही के साथ कवियों का उत्साहवर्धन किया।
