स्कूल मर्जर से पहले स्टूडेंट-टीचर की शेयरिंग हो, पीएम की आर्थिक सलाहकार परिषद की रिपोर्ट

देश में स्कूलों को बंद करने और उनके विलय को लेकर प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्यों की एक रिपोर्ट सामने आई है. इसमें स्कूलों को मर्ज करने से पहले स्टूडेंट्स और टीचर्स की संख्या के आधार पर उनकी क्षमता साझा करने की सलाह दी गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूलों का विलय अंतिम विकल्प होना चाहिए. इसके लिए पहले कई जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी.
साथ ही हर जिले में अगले 10 वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखकर स्कूलों की योजना तैयार की जानी चाहिए. रिपोर्ट में अभिभावकों, शिक्षकों और स्थानीय निकायों की राय को भी जरूरी बताया गया है.
स्कूलों के विलय से पहले बने 10 साल का प्लान
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्यों की ओर से तैयार कार्यकारी पत्र में कहा गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत छोटे स्कूलों का युक्तिकरण किया जा सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया पारदर्शी और सोच समझकर होनी चाहिए. रिपोर्ट का शीर्षक ‘नई शिक्षा नीति 2020 के तहत भारत अपनी शैक्षिक क्षमता को कैसे बदल रहा है’ है.
शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में देश के 93 हजार से ज्यादा स्कूल बंद हुए हैं. इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और ओडिशा में सबसे ज्यादा स्कूल बंद हुए हैं.
रिपोर्ट में क्या सुझाव दिए गए हैं?
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि प्रत्येक जिले को अगले 10 वर्षों के लिए स्कूलों की जरूरत का आकलन करना चाहिए. इसमें 5 से 9 वर्ष, 10 से 14 वर्ष और 15 से 19 वर्ष के बच्चों की संख्या को ध्यान में रखा जाए. इसके अलावा जन्म दर, आबादी का विस्तार, नई बस्तियां, सड़कें और लोगों के पलायन जैसे पहलुओं को भी योजना में शामिल किया जाए.
स्कूल कॉम्प्लेक्स मॉडल के तहत साझा हों सुविधाएं
रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कूलों को बंद करने के बजाय पहले उनके बीच संसाधनों और शिक्षकों को साझा करने की व्यवस्था बनाई जाए. NEP 2020 के स्कूल कॉम्प्लेक्स मॉडल के तहत आसपास के स्कूल शिक्षक, लाइब्रेरी, प्रयोगशाला और अन्य सुविधाएं साझा कर सकते हैं. इससे स्कूलों में पढ़ाई जारी रखते हुए संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकेगा.
स्पेशल टीचर्स, काउंसलर, लाइब्रेरी, प्रयोगशालाओं और वर्कशॉप की सुविधा भी एक से ज्यादा स्कूलों को दी जा सकती है. रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि डिजिटल सुविधाएं टीचर्स की कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकती हैं, लेकिन कक्षा में टीचर की जगह नहीं ले सकतीं.
विलय से पहले पूरी करनी होंगी ये शर्तें
रिपोर्ट के मुताबिक, किसी स्कूल का विलय करने से पहले नए स्कूल में पर्याप्त कक्षाएं, शिक्षक, स्वच्छता, मिड-डे मील, दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए सुविधाएं और ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था होनी चाहिए. जब तक नया स्कूल और उसके लिए ट्रांसपोर्ट व्यवस्था तैयार नहीं हो जाती, तब तक पुराने स्कूल में रेगुलर पढ़ाई बंद नहीं की जानी चाहिए. इसके अलावा विलय के प्रस्ताव पर अभिभावकों, शिक्षकों, स्थानीय निकायों की राय भी ली जानी चाहिए. राज्य सरकार को जिला कार्यालय से अलग स्तर पर फैसले की समीक्षा करनी चाहिए.
विलय के बाद भी दो साल तक होगी निगरानी
रिपोर्ट में स्कूलों के विलय के बाद स्टूडेंट्स की स्थिति पर नजर रखने की सिफारिश की गई है. इसके तहत कम से कम दो साल तक बच्चों की अटेंडेंस, पढ़ाई जारी रखने, अगली कक्षा में पहुंचने और सीखने के स्तर की निगरानी होनी चाहिए.
साथ ही, UDISE+ पोर्टल पर स्कूलों के पुराने और नए कोड का रिकॉर्ड रखा जाए. इससे यह पता चल सकेगा कि कोई स्कूल बंद हुआ है, दूसरे स्कूल में मर्ज हुआ है या उसका अपग्रेडेशन किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, स्कूलों का विलय करने का फैसला केवल नामांकन में गिरावट के आधार पर नहीं होना चाहिए, बल्कि स्टूडेंट्स की वास्तविक जरूरतों और स्कूल तक पहुंच को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए.




