डॉक्टरों की इस खास पहल से 7 भारतीय बच्चों को मिली नई जिंदगी

डॉक्टरों की इस खास पहल से 7 भारतीय बच्चों को मिली नई जिंदगी
भारतीय और डच डॉक्टर्स ने कई सिविल सोसाइटी संगठनों के साथ मिलकर भारत के सात बच्चों के लिए एक दुर्लभ बीमारी की दवा उपलब्ध करवा रहे हैं। इसके लिए The Hague में कंपाउंडिंग के जरिए दवाओं को तैयार करके भारत भेजा जा रहा है।
अब सवाल आता है कि कंपाउंडिंग होती क्या है, जिसके जरिए इन दवाओं को भारत भेजा जा रहा है। कंपाउंडिंग एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें किसी दवा को छोटी मात्रा में कस्टम-मेड तैयार किया जाता है। आइए जानें इस बारे में।
आसमान छूते दामों से राहत
ट्रांसवाल फार्मेसी की ट्राइट्रिकॉल नाम की दवा की हर कैप्सूल केवल 1.8 यूरो में तैयार किया जाएगा। ये कीमत जर्मनी में बेची जा रही स्वीडिश कंपनी की कर्मशियल दवा के मुकाबले 99 गुना कम है, जहां दवा 180 यूरो प्रति टैबलेट मिलती है।
फिलहाल इन सात बच्चों में से एक बच्चे का परिवार जर्मनी से इस दवा को मंगा रहा है, जिसका खर्च हर महीने 3 लाख रुपए आ रहा है। आपको बता दें कि ये दवा जिंदगीभर के लिए निर्धारित की गई है, इसलिए इसे लगातार खरीदना परिवार के लिए फाइनेंशियली काफी मुश्किल साबित हो रहा है।
क्या है ये दुर्लभ बीमारी?
ये सातों बच्चे एलन हर्नडन-डडली सिंड्रोम (AHDS) नाम की एक बीमारी से पीड़ित है, जिसे MCT8 डेफिशिएंसी भी कहा जाता है। इस बीमारी में जेनेटिक डिफेक्ट की वजह से थायरॉइड हार्मोन ठीक से दिमाग के सेल्स तक नहीं पहुंच पाते, जिससे गंभीर विकासात्मक समस्याएं पैदा होती हैं।
इरास्मस यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर की एक रिसर्च में साबित हुआ है कि 1953 से जानी जाने वाली दवा ट्राइट्रिकॉल इस बीमारी के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकती है।
इस दवा को फ्रांस में 1974 से थायरॉइड के मरीजों के इलाज के लिए बाजारों में उपलब्ध है। साल 2014 में इरास्मस एमसी के डॉक्टर्स ने रिसर्च में पता लगाया कि इस दवा का इस्तेमाल AHDS के इलाज के लिए भी किया जा सकता है।
कैसे बढ़ी कीमतें?
इरास्मस एमसी ने इस दवा के आईपी राइट्स बिना किसी फेयर प्राइस क्लॉज के इगेटिस कंपनी को बेच दिए थे। साल 2025 में, इगेटिस को ट्राइट्रिकॉल के लिए यूरोपीय मार्केटिंग अथॉराइजेशन मिल गया, जिससे ऑर्फन ड्रग लेजिग्लेशन के तरत उसे 10 साल की मार्केट मोनोपॉलि मिल गई।
साल 2017 में फ्रांस में जो दवा 0.35 यरो प्रति टैबलेट बिकती थी, उसकी कीमत साल 2026 तक जर्मनी में बढ़कर लगभग 180 यूरो प्रति टैबलेट हो गई। अब नीदरलैंड्स की फार्मास्युटिकल अकाउंटेबिलिटी फाउंडेशन भारत के बच्चों तक इस दवा को पहुंचाने में मदद कर रही है।
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